समाज का दोगलापंथी

कुछ करके दिखाओ तो माने, क्या कर रहे हो आजकल?क्या सोच रहे हो फ्यूचर का?बेटा आइआइटी की तैयारी कर लो,एसएससी की कर लो, ये सब प्रश्न आज का बेहूदा समाज जो की कुछ भी नही है बस एक चुतियापा है वो हमसे पूछ रहा है।क्यों करें हम इन सबकी तैयारी?जो मन में आये वो करूँगा मै,आपको क्या समस्या है?आप क्यूँ इतने चिंता में डूबे हैं।आपकी कोई अपनी ज़िन्दगी नही है क्या?जो हर वक़्त चाय में बिस्किट की तरह डूब कर गिर जाते हैं।हम सबकी ख़ुशी चाहते हैं लेकिन खुद की भी तो जरुरी है।खुद खुश रहूंगा तो तभी सबको थोडा बहुत तो खुश कर ही सकता हूँ।वो कैसे कपडे पहनता है,वो काला है,वो गोरा है,वो मोटा है,वो कैसे खाता है ये सब क्यूँ?अब भाई जो जैसे है वैसे ही तो रहेगा,वैसे ही जीयेगा लेकिन ये समाज जिसको हर चीज़ में ऊँगली करनी होती है वो कूद कर बाहर आ जायेगा।इतनी रेस्ट्रिक्शन क्यों?हम खुद को एक मायावी घेरे के अंदर बाउंड कर लेते हैं और फिर उसी में घूमेंगे और कहेंगे की हम से कुछ होता ही नही है।जब तक लोगो को दिखाने के लिए चीज़े करोगे तब तक आप कूप के मेढक ही रहोगे।और आजकल सबसे बड़ा जो चुतियापा चल रहा है वो है धर्म और राजनीति।धर्म साला बनाया किसने बे?धर्म  लोगो को जोड़ तो बिल्कुल नही सकता हाँ लेकिन आप को एक ऐसे गोले में डालेगा की आप उसी में गोल गोल घूमेंगे।मतलब आप फिर अपने आप को रेस्ट्रिक्ट कर रहे हैं।खुद को अगर जीना है तो गोले से बाहर मत आइय केवल बल्कि उस गोले को भी मिटा कर आइये।भगवान,अल्लाह,यीशु,बुद्ध सबने आपका चुतिया ही काटा है।कौन सा भगवान है जो ये कहता है बेटी परायी धन है,बेटी मत पैदा करो, बेटा वंश बढ़ाने के लिए जरुरी होता है..महिलाओं को काले कपडे में जकड़ कर रखो,परदे के पीछे रखो,उनका काम है हाउसकीपिंग का केवल।सब चुतियाप है बॉस।साला वही पादरी पहले महिलाओं को सुंदर लड़कियो को भूत प्रेत कह कर रेप करता था और आज ज्ञान बांट रहा।और हाँ जो लोग ये पढ़कर फालतू का भगवान पर ज्ञान बाटना चाहते हैं,कृपया आप इग्नोर करें।ये पोस्ट आपके लिए नही है। मैं मानता हूँ आप खुद को सीमित मत करिये।केवल गीता,कुरान,और बाइबिल या त्रिपटक या कुछ भी पढ़ने से आप ज्ञानी नही हो सकते।वो किसी का व्यू है,पढ़ लीजिये और समझ लीजिये लेकिन जब आप उसका दुरुपयोग करंगे और कहेंगे की केवल यही सही है और सब गलत तब आप चुतिया बन गए हैं।
अब राजनीति पर,पहले के कुछ नेताओं को छोड़िये जिनका मकसद गुलामी(मानसिक और शारीरिक) से आजाद कराना था ।आज कल बस नेता वही है जो आपका पेट पर लात मारके अपना पेट भरे।मैं इनको ज्यादा कुछ नही कहूँगा क्यूँ की आप लोग समझदार हैं।बस हाँ किसी के चक्कर में (धर्म,जाति, राजनीति) न पड़कर किसी के साथ बहस करें।
नोट:-मैंने कुछ ऐसे शब्दों का यूज किया है जो इस चूतिये समाज में बोला जाता है और समझा जाता है और लोगो को सही भी लगता है लेकिन फिर भी लोग ओफ्फेन्सिव हो जाते हैं।वो लोग इस पोस्ट से दूर रहें क्यों की आप डबल स्टैण्डर्ड लोग हैं,एक तरफ इन शब्दों का इस्तेमाल करंगे और दूसरी तरफ छी छी का नाटक।
Nimesh tripathi©2018

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How to argue?
I asked a question,
They didn’t answer.
They asked me back to back questions,
I said,”i need answer”
They didn’t answer.
I was curious,
I was wondering,
But,
I end up with frustration,
And I said,,
Fuck off people!!
Now i don’t ask question,
I sit with a cup of tea,
And observe from my badass eyes,
And thinking,
Why the hell are these morons on this beautiful planet.
Nimesh Tripathi©2018

जाल

हर राह पर चला जा रहा हूँ,

हर चाह की कोशिश में,

हर वक़्त स्वयं को पा रहा हूँ,

जिंदगी के जाल में|

Nimesh Tripathi©2018

बेटा पढ़ाओ–(बलात्कार खत्म होगा)(बेटियां समझदार होती हैं)

इक छोटी बिटिया,

या प्यारी बहना,

झूम रही थी अपने धुन में,

लेकर एक खिलौना।

सबकी है दुलारी वह,

है परिवार की गहना,

देवी की तरह पूजते उसे,

ऐसा सबका है कहना।

आखिर फिर भी क्यूँ,

लोगो ने बना दिया,

इस बिटिया को खिलौना।

जिस से जन्म लिया,

उसी को मारना,

क्या बन गया पुरुष तू,

हो रही तेरी भर्त्सना।

नौ महीने का दर्द झेलकर,

हमने तुझे दिया है जीवन,

बस ये कर्ज चुकाने के बदले,

अब मानव बन जा इंसान।

विशेष-

इस बलात्कारी समाज के बलात्कारी सोच को बदलने के लिए निंदा करना बन्द करिये।हम और आप किसी घटना की निंदा करते हुए दिख जायँगे और फिर कुछ दिनों बाद भूल भी जायँगे।बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ…मुझे लगता है बेटों को पढ़ाना ज्यादा जरुरी है।यह कदम हमारे और आपके परिवार से शुरू होगा,न की फेसबुक और टिवटर पर न्यूज़ शेयर करने से होगा।मीडिया केवल टी आर पी और नेता साले अपनी जेब भरने के लिए पैदा हुए हैं।न तो मीडिया और न नेता को आपसे मतलब है।अपने बेटे और बेटियो में भेदभाव करना बन्द करिये।आज जो भी समाज है ये और जिस तरफ जा रहा उसकी नैतिक जिम्मेवारी आपकी है।रेप अपने आप नही होगा अगर वह वहसी दरिंदा इंसानियत के मूल्यों को जानता है।

मै थक चुका हूँ इस पुरुष प्रधान समाज से और गलत नारीवाद के प्रभाव से।

मै पानी हूँ

मै बहता हुआ पानी हूँ,

पत्थरों को काटते,

जमीं पर रेंगते,

जंगलो से गुजरते ,

अपना रास्ता खुद ही बनाते,

लोगों के जिंदगी का अहम हिस्सा हूँ,

अब तो मै समन्दर से भी मिल गया,

लेकिन

मै अभी भी पानी हूँ|

🇮🇳Nimesh Tripathi ©2018🇮🇳

I am flowing water,

cutting stones,

crawling on the field,

passing through forests,

making way for myself,

I’m the necessary part of life of people,

Now,I met with oceans,

But,

I’m still water.

🇮🇳Nimesh Tripathi ©2018🇮🇳

 

क्रांतिकारी मन

पता नही कब मेरे ख्वाब क्रांतिकारी हो गए,

कभी बिस्मिल तो कभी सूर्य सेन हो गए।

पता नही कब ये लूटने की प्रथा बन्द होगी,

भूखे,गरीबों और किसानों की दशा परिवर्तित होगी,

अब तो बस कभी “पाश” और कभी आजाद बनने का मन करता है,

जिस मिट्टी में जन्म लिया उसके लिए कुछ करने का मन करता है,

अब बस क्रांतिकारी बनने का मन करता है।

Nimesh Tripathi©2018

बेटी,शादी और सपनें-एक कहानी

वो चली जा रही थी,न रुक रही थी,न सुन रही थी|आँख में अश्रु की धार लिए,काजल  उसकी आँखों से बहकर चेहरे पर आ गये थे|जैसे मानो कालिख सी लग गयी थी पुरे चेहरे पर।अचनाक ही वह रुकी,थोड़ी देर वह सिर नीचे झुकाकर, वह शहर के बीच में बने पार्क में बैठ गयी।ऐसा लगा मानो की वह कुछ छुपा रही हो।मैं दूर से खड़ा होकर उसे देख रहा था|पता नही क्यूं ,मुझे ऐसा लगा की इसके पास जाना चाहिए|थोड़ा पास गया मै और मानवता के कारण मैंने उसे अपनी पानी की बोतल दिया और बोला आप मुँह धो लीजिये।मै हर शाम को उस पार्क में अपना अकेलापन दूर करने के बहाने टहलने आता था।पहले तो उसने मना किया,लेकिन मेरे बार बार कहने पर उसने बोतल लिया और मुँह धो लिया।उसने मुझे ‘धन्यवाद’ कहा और फिर अपने दुपट्टे से अपना चेहरा साफ़ किया।मैंने उससे उसी लहजे में पूछा आप रो क्यूँ रही थी?उसने उत्तर दिया”बस यूँ ही”|मैंने कहा,”बेटा,कोई यूँ ही तो नही रोता है।”
फिर उसने कहा की आपको क्या फ़र्क़ पड़ेगा और आप जानकर भी कुछ नही कर सकते।
मैंने कहा, पहले बताइये तो सही।फिर उसने बोला की मेरी शादी कुछ दिन पहले हुई है।पापा ने लड़का तो अच्छा देख कर किया,परिवार अच्छा है,सब बढ़िया है बेटा शादी कर लो।ऐसा परिवार फिर कभी नही मिलेगा।मेरा बारहवीं की परीक्षा खत्म हुई और शादी की तारीख तय हुई।शादी हो गयी और मै बस अभी 18वर्ष की हूँ।वो(पति) और मै एक दूसरे को सही से जानते भी नही थे।शादी के अगले ही दिन वो हमे लेकर शहर आ गए।यहाँ पर ये एक फैक्ट्री में सेल्स मैनेजर के पद पर काम करते है।मेरी उम्र ही क्या है,ये कहकर वो लड़की फिर से रोने लगी।मैंने उसे पानी दिया और बोला बेटा  रोते नही हैं और फिर उसको पार्क के बगल ही एक चाय की दुकान पर मना कर ले लाया।शाम ढल चुकी थी।घर पर सब्जी भी लेकर जाना था।फिर उस लड़की ने मुझे बाबा जी धन्यवाद कहा।मेरे कान में जब ये ध्वनि पड़ी तो आँखों में आंसू आ गए।कई वर्ष लग गए इस शब्द को सुनने में।दरअसल बाबा जी का एकमात्र लड़का था जो भारतीय फौज में सेना का जवान था।उसकी मौत कुछ वर्ष पहले ही आतंकवादियों से एक मुठभेड़ में हुई थी।वह बहुत ही बहादुर नौजवान था।किसी की भी बात कभी मना नही करता था।उसका नाम “अमर” था,लेकिन प्यार से उसे लोग “छोटे” बुलाते थे।उनकी एक इच्छा थी की उनकी एक पोती हो और जिसे वो वकील बनाएं।उनकी वो इच्छा तो पूरी नही हो सकी और तब से केवल वह शाम को पार्क में टहलने आते थे और उसके बाद “रामू, चाय की दुकान”पर एक चाय पीते थे और वहां से फिर सब्जी लेकर घर चले जाते।वो अपने परिवार में अकेले सदस्य बचे थे।उन्होंने लड़की से बोला “बेटा,शाम हो गयी है”आपका घर कहाँ पर है?लड़की ने कहा” मुझे घर नही जाना है”उसने कहा मेरे पति मुझे मारते पीटते हैं।मै पढ़ना चाहती हूँ,मुझे वहाँ नही जाना।और लड़की फिर से रोने लगी।दादा जी ने उसका हाँथ पकड़ा की तभी लड़की उन्हें गले से लिपट कर रोने लगी,ऐसा लगा की जैसे वो अपने घर से शादी करके ससुराल जा रही हो।दादा जी अपने घर ले गए उसे।दादा जी सुबह देर से उठते थे,उम्र जो हो गयी थी।दादा जी लड़की को देखने गए तो वो वहां पर थी ही नही।मेज पर किनारे वहीं एक पेपर का एक टुकड़ा पड़ा था। जिस पर लिखा था,
दादा जी आपका ढेर सारा आभार,आज आपने मेरी ज़िन्दगी बचा ली।कल मैं नदी के ऊपर बने पुल से कूदने जा रही थी।यहीं एक डायरी पड़ी थी,रात में मैंने पढ़ी इसे।सम्भवतः ये आपकी रही होगी। आपके जीवन में इतनी समस्याएं आयीं और गयीं फिर भी आप आज फक्र के साथ जी रहे हैं और अपनी ज़िन्दगी में खुश हैं।हर समस्या को आपने चुनौती के तौर पर लिया और जीत हासिल की।मेरी अभी उम्र ही क्या है।आगे जो लिखा था ये पढ़ कर मेरा रूह कांप गया।मेरे पति मुझसे जबरदस्ती शारीरिक सम्बन्ध बनाने की कोशिश कर रहे थे,मै अभी बच्ची हूँ।मै पहले इस इंसान को जानना चाहती थी,पहचानना चाहती थी,बात करना चाहती थी।हम अभी अपरिचित थे।ये सब मेरे लिए कैसे सम्भव था की मै अपने आप को तुरन्त उनके हवाले करके सब कुछ करने को तैयार हो जाऊँ।मेरे साथ इसी वजह से मेरे पति ने मुझे रोज मारते थे और मुझे एक मजदूर की तरह बर्ताव करते थे।मैंने अब ठान लिया है की अब मै खुद अपने घर जाउंगी और हर समस्या का सामना करूंगी और अपने सपनों को जीने की कोशिश करूंगी।समस्या से भाग कर कुछ नही मिलेगा,सामना करके ही जीत हासिल होगी।
आपकी बेटी।
दादा जी यह पत्र पढ़ कर रो पड़े।उन्होंने उस बिटिया को खोजने की कोशिश की,परन्तु उस सड़क की भीड़ ने लगा उसे निगल लिया हो।हर जाते हुए लड़की को उसी निगाह से देख रहे थे जैसे वो बिटिया कभी तो वापिस लौटेगी।

नोट-यह एक कहानी तो है,लेकिन ये हमारे समाज की सच्चाई है।हम अपने बहन-बेटियों को एक बोझ मानते हैं।जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी उसे अपने घर से विदा कर देते हैं।कृपया करके आपसे मेरी विनती है की आप जो भी उसके शादी में जितना प्रयास कर रहे हैं,उसकी पढ़ाई और उसके सपनो को जीने का पंख दें।ये उसके लिए और समाज के लिए और इस देश के लिए बेहतरी होगी
Nimesh Tripathi©2018

धर्म,इंसान और कुत्ता

फ़िराक़ में हूँ मैं,
पता नहीं कौनसे फ़िराक़ में,
भागने के,
या चलने के,
शोषण के,
या पोषण के
तोड़ने के,
या जोड़ने के,
युद्ध के,
या सन्धि के,
जीत के,
या हार के,
मैं धर्म हूँ।
हाँ मै धर्म हूँ,
मैं वही हूँ,
जिसने इस दुनिया को बाँट दिया,
मै वही हूँ,
जिसने रंगो को बाँट दिया,
मै वही हूँ,
जिससे इंसानो ने कत्ल किया,
मै वही हूँ,
मै कुछ भी नही होते हुए भी बहुत कुछ हूँ,
मेरा कोई आकार नही है,
मै कोई वास्तविकता नहीं हूँ,
पर ये तो तुम जानो,
तुमने मुझे इतना तवज्जो क्यूँ दिया,
तुम तो वास्तविक थे,
क्या सही क्या गलत,
ये तुम्हे तो पता था?
तुम कब गुलाम हुए ये तुम्हे नहीं पता,
क्योंकि तुमने अपनी आँखे बन्द रखी हैं,
और आँखे खोल कर तुम कुछ कर भी नही पाओगे,
क्योंकि तुममें वो अब बात नही रही,
तुम निर्जीव हो गए हो,
तुम तो कुत्तों भी नही रहे,
कुत्ते तो आज भी अपनी वफ़ादारी अदा करते हैं,
तुम सब शेर बन रहे थे न?
बन जाओ अब शेर,
क्यूँ की तुम किसी को भी निचोड़ कर खा सकते हो,
आज तुम्हारे अलग चेहरे हैं,
कोई भी किसी भी रूप में तुम हो,
और हाँ सुनो,
तुम दूर रहो,
क्यूँ की मै कुत्ता ही सही हूँ,
इंसान बनना अब बेवकूफी है।

Nimesh Tripathi©2018

सड़क-एक सफर

सड़क जो कभी पथरीली होती है,

तो कभी धूल भरी मिट्टी से भरी पड़ी होती है।

ये वही सड़क है जो कभी पतली सी हो तो डगर कही जाती है,

तो कभी ईंट से बनी यह सड़क खड़न्जा होती है।

यह हमें स्कूल तक ले जाती है,

कभी कभी बारिश के दिनों में सुकून दे जाती है,

सड़क लोगो से बिल्कुल अलग केवल जोड़ने का काम करती है,

यह वो समाज तो नही जो केवल तोड़ने का काम करती है,

ये बस बिना जाति,धर्म,लिंग के भेदभाव के बिना सबको आने जाने देती है,

ऐसा क्यूँ यह सबकुछ सहते हुए भी सबकुछ समझ लेती है।

हम इंसान इतने आलसी हैं की हमारी सहनशीलता अब खत्म हो चली है,

हमारे अंदर जो बदलने की प्रथा थी अब वो ख़त्म हो चली है,

हर चीज़ का विनाश निश्चित तो है,

फिर भी अभिमान की ज्वाला अभी भी जल रही है।

सड़क की तरह बनो,जो बिना बोले सबको ढोते हुए चली जा रही है।

Nimesh tripathi©2018

बढ़ते रह

सड़को के किनारे न जाने इतनी हलचल क्यूँ

मुरझाये हुए चेहरे पर न जाने इतनी ख़ामोशी क्यूँ

इस बनावटी मुस्कान के पीछे इतनी उदासी क्यूँ

ज़िन्दगी के सफर में इतनी अड़चने क्यूँ

उम्मीद ही एक रास्ता है इसका,

फिर आगे बढ़ने में लड़खड़ाना क्यूँ?

Nimesh Tripathi©2018